छद्म-सेकुलरवाद से मुक्ति का समय,अब

अयोध्या में श्री राम मंदिर निर्माण कार्य का नेत्रदीपक शुभारम्भ करोड़ों भारतीयों और दुनिया भर में भारतीय मूल के लोगों ने गौरव पूर्वक देखा। जहाँ एक ओर कई सदियों के संघर्ष और सभी बाधाओं को पार कर करोड़ों भारतवासियों का स्वप्न साकार हो रहा था, वहीं दूसरी ओर भारत में सेक्युलरवाद (सेक्युलरिज़्म) के नाम पर सांप्रदायिक(कम्युनल) राजनीती करने वाले राजनेता और देश-विभाजनकारी गतिविधि की दुकान चलानेवाले बुद्धिजीवी-पत्रकार बहुत चिंतित होते दिखे। सांप्रदायिक राजनीति करने वाले कई सेक्युलर राजनेताओं ने तो बदलते हुए भारतीय जन-मानस को भाँप कर राम मंदिर संदर्भ में अपनी भूमिका ही बदल डाली, क्यों कि आनेवाले चुनावों में जनता का सामना करना पड़ सकता है। परन्तु, सेक्युलरवाद की आड़ में भारत-विभाजन की दुकानदारी करने वाले बुद्धिजीवी-पत्रकार एक नया राग अलापते दिख रहे हैं- “भारतीय संविधान खतरे में है, क्योंकि सेक्युलरिज़्म खतरे में है।” इस कथन से वे ऐसा भ्रम निर्मित करने का प्रयास कर रहे हैं कि मानो यह सेक्युलरवाद भारतीय संविधान का प्राण है जो आरम्भ ही से संविधान का अभिन्न अंग था। यह वैसा ही हुआ जैसे टाँगे के घोड़े को किसी का समझाना कि वह मुँह में लगाम लेकर ही पैदा हुआ था।

खुद को संविधान का हितैषी बताने वाले इन बुद्धिजीवियों का दावा है कि संविधान के साथ बहुत बड़ा धोखा (fraud) हो रहा है। वास्तव में सेक्युलर शब्द का संविधान में समावेश ही संविधान के साथ हुआ सबसे बड़ा धोखा था। ऐसा नहीं है कि हमारे संविधान निर्माता सेक्युलरवाद से परिचित नहीं थे। श्री के. टी. शाह के नए भारत को ‘सेक्युलर-सोशलिस्ट-रिपब्लिक’ कह कर वर्णित करने के सुझाव पर संविधान सभा में खूब चर्चा हुई थी, और, डॉक्टर आम्बेडकर और अन्य अनेक मूर्धन्य नेताओं सबका यह सुविचारित मत रहा कि भारत के लिए ‘सेक्युलरवाद’ आवश्यक नहीं है (it was found unnecessary). यूरोप के १००० वर्षों के पोप के मज़हबी राज्य (थिओक्रैटिक स्टेट) की प्रतिक्रिया के रूप में वहाँ सेक्युलरवाद की आवश्यकता सामने आई और उसे वहाँ लाया गया। वैसी स्थिति भारत के हजारों वर्षों के इतिहास में न कभी रही और हमारे अध्यात्म-आधारित एकात्म और सर्वांगीण हिन्दू चिंतन के चलते संविधान निर्माताओं को भविष्य में भी ऐसी सम्भावना नहीं दिखी।

सन् १९७६ में, जब देश में ‘इमरजेंसी’ लागू करी गई, जनतांत्रिक जीवन ठप्प था और संसद में विपक्ष अनुपस्थित था (क्योंकि विपक्ष के अधिकांश नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया था और जो जेल में नहीं थे वे भूमिगत थे) तब यह (सेक्युलरिज़म) शब्द संविधान में जोड़ा गया। सुव्यवस्थित भारतीय न्याय व्यवस्था में निचली अदालतों के निर्णयों को उच्च न्यायालयों में चुनौती देने का प्रावधान है। वहाँ समाधानकारक निर्णय न हो तो सर्वोच्च न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया जा सकता है। और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से भी समस्या-निवारण न हो तो न्यायाधीशों की बड़ी बेंच (अधिक सदस्य) के समक्ष अपना मत रखने का प्रावधान भी है। अगर समस्या का हल संविधान में परिवर्तन करना ही हो तो संसद में चर्चा कर पर्याप्त बहुमत के समर्थन से आप वह भी कर सकते हो। किंतु संविधान सभा द्वारा अस्वीकृत इस ‘सेक्युलर’ शब्द को संविधान में जोड़ने के लिए इन में से किसी भी प्रक्रिया का उपयोग नहीं हुआ। आपातकाल (इमरजेंसी) के आतंक में, बिना किसी आवश्यकता, बिना किसी मांग, और बिना किसी चर्चा या बहस के यह परिवर्तन संविधान के preamble में छल से किया गया। यही भारतीय संविधान के साथ हुआ सबसे बड़ा धोखा था।

जिस ‘सेक्युलरिज़्म’ शब्द ने आज हमारी जन-चेतना को जकड़ कर हमारे राष्ट्रीय और सामाजिक जीवन में बखेड़ा खड़ा कर दिया है उस शब्द का निश्‍चित अर्थ क्या है यह एक विवादास्पद विषय है। संविधान में इसकी व्याख्या नहीं की है। यह बाहरी संकल्पना हमारे संविधान पर थोपकर देश में प्रतिष्ठित कर जन-मानस को भ्रमित करने का प्रयास हो रहा है। सब उपासना पंथों को समान दृष्टि से देखना अथवा सबको समान अधिकार व समान अवसर उपलब्ध होना, ऐसा उसका अर्थ माना जाए तो, हिंदुओं की तो यह परंपरा ही रही है। इसलिए हिंदुबहुल देश होने के कारण भारतीय संविधान के प्रारम्भ (१९५०) से ही सब उपासना पंथों को समान अधिकार और अवसर का उसमें समावेश था। इतना ही नहीं, अल्पसंख्यक कहे जाने वाले उपासना पंथों के अनुयायियों को संविधान ने कुछ विशेष अधिकार दिए हैं जो बहुसंख्यक हिन्दू समाज को नहीं हैं। इन प्रावधानों के होते हुए भी ‘सेक्युलर’ शब्द को रातों-रात संविधान में जोड़ने का क्या अभिप्राय रहा होगा? उसके बाद सेकुलरवाद की आड़ में भारत में घटी घटनाओं के विश्लेषण से यह यह ध्यान में आता है कि देश में सांप्रदायिक राजनीति धड़ल्ले से हो और देश-विभाजक तत्वों को अपना एजेंडा साधने की खुली छूट व संरक्षण मिले इसी लिए सेकुलरिज्म का संविधान में कपट से मिश्रण हुआ। उसके परिणामस्वरूप आज समाज की क्या दशा हुई है? सेक्युलरिज़्म के नाम पर घोर सांप्रदायिकता और विघटनवाद को खुले आम पोषण और प्रोत्साहन दिया जाता रहा है और इस विघटनकारी वृत्ति का विरोध करने वालों को सांप्रदायिक कहकर कोसा और बदनाम किया जा रहा है।

देश के संसाधनों पर अल्पसंख्यकों का (मतलब मुसलमानों का) पहला अधिकार है, ऐसा घोर सांप्रदायिक विचार हमारे एक ‘सेक्युलर’ प्रधानमंत्री ने बिना हिचक प्रस्तुत किया था। उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालय के कई बार नकारने के बावज़ूद और संविधान-सम्मत न होते हुए भी सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण देने की बात कुछ सेक्युलर पार्टिंयों के नेता बार-बार करते दिखते हैं। भारत में राज्य यदि सेक्युलर है तो हज के लिए सरकारी सब्सिडी नहीं मिलनी चाहिए। इस्लाम के विशेषज्ञों की मानें तो किसी की सहायता लिए बिना अपने बलबूते पर किया गया हज ही इस्लाम में मान्य है। तभी अन्य किसी भी मुस्लिम देश में हज के लिए सरकारी सहायता नहीं दी जाती। यदि भारत में यह हो रहा है तो यह सेकुलरवाद-विरोधी है और इस्लाम-विरोधी भी। यहाँ त

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